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पुल

तुम्हारी  मेरी सोच नहीं मिलती 

तकरार बढ़ते जाते हैं

जो ना समय से  रोका तो  

मनमुटाव जरूरत से ज्यादा बढ़ जाते है

फासले बढ़ते जाते हैं

मौन को मत गहराने दो

संवाद बने रहने दो

बातों से भी तो मसले हल किये जा सकते है

अहम् की दीवार बीच में ना आने दो

रिश्ते मत तोड़ो

रिश्तों में दरार ना आने दो 

अहम् को इतना भी ना खींचो  कि

पुल बनाने की जगह न बचे 

मिलें तो एक दुसरे को देख मुंह फेर ले 

राष्ट्रकवि दिनकर: 111वाँ जन्मदिवस 

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की स्मृति को उनके 111वें जन्मदिवस पर भावपूर्ण पुष्पांजलि! -https://rkkblog1951.wordpress.com

R K Karnani blog

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की स्मृति को उनके 111वें जन्मदिवस पर भावपूर्ण पुष्पांजलि! 

RKK Collection Dinkar

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सलाह

प्यार है तो जताया भी करो 

दर्द है तो बताया भी करो 

रूठे हुओं को मनाया भी करो 

जज़्बात छिपाये तो 

टीस उठेगी 

छिपाने की जगह दिखाया भी करो 

ज्यादा दिन दूर रहने से 

दूरियां बढ़ जाती हैं 

कभी कभी दोस्तों से मिल आया भी करो 

बिन मांगी सलाह बहुत देते हो मेरी जान
कभी अपनी सलाह पर भी अमल कर आया करो

Somkritya’s artwork

ज़िन्दगी और मौत

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मौत ने पूछा
ज़िंदगी एक छलावा है
एक झूट है
हर दिन हर पल तुम्हारा साथ छोड़ती जाती है
फिर भी तुम उसे प्यार करते हो
मैं एक सच्चाई हूँ अंत तक तुम्हारा साथ निभाती हूँ
पर फिर भी तुम मुझसे नफरत करते हो
मुझसे डरते हो
मुझसे समझौता कर लो
फिर कोई डर तुम्हें डरा न पायेगा
मैंने कहा
तुम सत्य हो शाश्वत हो
अनिवार्य हो
पर तुमसे कैसे समझौता करलूं
तुम्हारी टाइमिंग बहुत गलत होती है
तुम गलत समय पर गलत लोगों को ले जाती हो
तुम गलत समय पर गलत तरीके से आती हो
पूछो उन बदनसीब अभिवावकों से
जिन्होंने खोए अपने लाल असमय
पूछो उन से ,
जिन्होंने ने गवाए अपने परिजन
आतंकवादियों के हाथों
उम्र  ना थी  की
जान गवाने की

जो मजबूर पीड़ित , बीमार

मरने की प्रार्थना करते हैं
उन्हें तुम तड़पने को छोड़ देती हो
बच्चों ,जवानों को अपना शिकार बनाती हो
कैसे करलूं तुमसे समझौता
तुम कड़वा सच हो, अनिवार्य हो पर
न्यायसंगत नहीं
काम से काम मेरी नज़र में तो नहीं
ज़िन्दगी लाख छलावा सही
मीठा झूठ सही
पर सुन्दर है जीने का,
लड़ने का हौसला देती है

इंदिरा

वादा

बस 

अभी आता हूँ 

तुम रुको 

वादा रहा 

तुमने कहा 

मैं 

तब से इंतज़ार में हूँ 

दिन बीते 

रातें बीतीं 

मौसम बीते 

अब तब करते करते 

न जाने कितनी 

सदियाँ बीतीं  

ना तुम आये 

ना कोई पाती

ये अब कितना लम्बा होता है 

कोई मुझे समझाए  

~Indira

 

भाव

ख़त  जले राख बन कर उड़ गए

भाव तो दिल पर खुदे थे रह गए

कितने ही रंग भरो 

कितने ही रंग भरो 

कुछ बच  ही जाता है 

कितने ही ख्वाब बुनो 

कुछ छूट ही जाता है 

जीवन है एक पहेली 

या फिर  एक भूलभुलैया 

ढूढ़ने की कोशिश में 

कुछ हाथ न आता है 

मत मतलब ढूंढो तुम 

न मक़सद करो तलाश 

जितने भी रंग मिलें 

उनसे ही सजाओ जीवन 

जो इससे  चूकेगा 

पीछे ही रह  जाता है 

 

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