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Monthly Archives: अक्टूबर 2012



सारा जीवन घूम के, ज्ञान के मोती जमा किये,
सोचा साथ ना जायेगा, कहाँ मैं घूमू लिए लिये |
मोती बाँटन ज्ञान के ,जब बंजारा हुआ खड़ा ,
देखा यहाँ तो हर कोई, है मोती से हुआ जड़ा|
शीश झुकाया उसने सबको,और ये बात है मानी,
समझदार हैं सभी यहाँ ,सभी यहाँ पर ज्ञानी|
अब उसने है बंद की, देना सब को सीख,
अपना ज्ञान भुलाकर मांगे ,सबसे ज्ञान की भीख |


CHAH/मैंने कब चाहा?

मैंने कब चाहा चाँद सितारे तोड़ के लाओ तुम
मैंने कब चाहा गहनों से मुझे सजाओ तुम
मैंने कब चाहा राह मेरी फूलों से भर दो तुम
मैंने कब चाहा मेरे लिए हरदम मुस्काओ तुम
मैंने कब चाहा मेरे लिए सबको बिसराओ तुम
मैंने कब चाहा अपने सपने मुझ पर वारो तुम
मैंने कब चाहा मेरे लिए कर्तव्य भुला दो तुम
मैंने कब चाहा मेरे लिए अधिकार छोड़ दो तुम
मैंने कब चाहा मेरे लिए दुनिया को जीतो तुम
मैंने तो चाहा प्यार और बस दिल में छोटा सा कोना
मैंने कब चाहा पूजो और मंदिर में बिठाओ तुम

Babsje Heron

Great Blue Herons: A study in patience and grace

P.A. Moed

Creative Exploration in Words and Pictures


Through life and strife, all may still thrive.

Mugilan Raju

Prime my subconscious, one hint at a time


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haikai poetry matters

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Canadian/Norwegian Blogger & Freelance Writer


Everyday musings ....Life as I see space, my reflections and thoughts !!



A Life Less Ordinary With SauraBhavna

Fight for the fairytale, it does exist


living life in conscious reality

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~wandering through life in my time never know where it will stop next~

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