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Author Archives: Indira

कितने ही रंग भरो 

कितने ही रंग भरो 

कुछ बच  ही जाता है 

कितने ही ख्वाब बुनो 

कुछ छूट ही जाता है 

जीवन है एक पहेली 

या फिर  एक भूलभुलैया 

ढूढ़ने की कोशिश में 

कुछ हाथ न आता है 

मत मतलब ढूंढो तुम 

न मक़सद करो तलाश 

जितने भी रंग मिलें 

उनसे ही सजाओ जीवन 

जो इससे चुकेगा 

पीछे ही रह  जाता है 

 

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Maa/ माँ

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बचपन में कहते

माँ एक कहानी सुना
अब कहते माँ
कोई कहानी मत बना
पहले मेरे  आंसुओं पर
तुम्हारे आंसूं पड़ते  निकल
अब मां  के आंसूं
लगते  इमोशनल  ब्लैकमेल
कहाँ कोई गलती हो जाती है
या शिक्षा में खुछ कमी रह जाती है
समझने समझाने में
एक उम्र निकल जाती है
खुशनसीब मिलता है वो
जिन्हे मिलता प्यार उम्र भर
वर्ना कई दाने दाने को तरसते हैं
भटकते हैं दर बदर
~Indira

हमारे नेता

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जब नेता सोये,  जनता रोये

जब जनता सोये, नेता खुश
मौज करेंगें , राज करेंगें
नए नए नारे और वादे
जनता को बेहोश रखेंगे
जागन की कोशिश जो करेंगे
करेंगे उसकी टायें  टायें फुस
अपनी ढपली खुद ही बजाएं
अपना अपना महिमा गान
काम काज अब कौन करे
जब  होये बिना काम मतलब सिद्ध
किस्मे  हिम्मत है
कौन करे गुब्बारा  फुस्स
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मलाल / Malal

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बींधा
तीखी बातों से
एक दूजे को
हरदम
अब देखो वो जख्म
भीतर कैसे पलता है
लाख बिसारना चाहो
कांटे सा कसकता है
टीस उठे  हर  वक़्त
मरहम काम  ना करता है
नासूर बन न  जाये कहीं
हरदम  खून सा रिसता  है
वक़्त पर माफ़ी
मांग ली होती,
रहता नहीं मलाल
तुम भी चुप बैठे रहे
जैसे फर्क क्या पड़ता है
अहम् हमारा टकराये
मन कांच दरकता है
मन आहत पर
चेहरा बुजदिल
मुस्कानों को ढोता
हर रिश्ते का
एक मुखौटा
चिपका लेता है
~ इंदिरा

नाते -रिश्ते 

कितने नाते टूट गए 

कितने साथी रूठ  गए 
हम तो जहाँ थे  वहीँ रहे 
ना  जाने  सब कहाँ पर छूट गए 
नए नए साथी, नए नए रिश्ते 
बने  भी और बिखर गए 
जिससे  जितनी लिखी थी 
उतना ही साथ निभा गए 

यादें ही रह जाती हैं 

बस बातें ही बच जाती हैं 
कमी बहुत खलती है  मगर
दिन भी यूं ही  गुज़र गए 
भीड़ में आँखे खोजती हैं 
भूले , भटके ,कोई मिल जाए 
पर दुनिया एक सराय  है 
स आये, ठहरे और चले  गए 
~ इंदिरा 

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस/Women’s International Day/ Hindi Kavita/ ईमानदारी

Women’s International Day एक प्रस्तुति

बस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
पर सम्मान,

बाकि दिन टालमटोल  ,

इसमें ए नादान  दुनियावालों,

ईमानदारी कैसी?

बेटे, बेटी में करे फर्क, 

न दे बराबर का हक़ और सम्मान,

  वो ममता कैसी ?

बहू  बेटी में करे फ़र्क़,

लाख झगडे पर बहू को न मनाये 

तो सासु माँ कैसी ?

सबकी सुनते रहे, 

किसी से न शिकायत की 

ऐसी भी दोस्तों अच्छाई कैसी?

कितनी भी टूटे, 

मोतियों सी पिरोई न गयी, 

वो दोस्ती, वो रिश्तेदारी कैसी?

प्यार का वादा ,

साथ निभाने की कसमें ,

झूठी हो जाएँ तो,

वफ़ादारी  कैसी? 

खुदा ने नहीं किया फर्क 

देने में नियामत अपनी,

फिर बन्दे तेरी हुकुमदारी कैसी?

~ Indira

 

Happy woman jumping on beach

Image source-

https://www.achhikhabar.com/2013/03/07/international-womens-day-in-hindi

 

 
 

एक कविता डोंगी बाबाओं भक्तों और के नाम पर

एक कविता डोंगी बाबाओं और भक्तों के नाम पर 

दाढ़ी बाल  बढ़ाये के बन  बैठे ये  संत,

उसे संवारें समय गवाएं मोह का नाहीं अंत

मोह का नाहीं अंत करें न कछु भलायी 

मार  काट करें धरम नाम पर अहम् से प्रीत लगाई

अहम् से प्रीत लगाई  सबको समझे  ओछा 

करो अंत इन सबका मारो झाड़ू पोछा

मारो झाड़ू पोछा क्योंकि  धरम तो प्यार सिखावे

और  ये करते धरम नाम पर  घोटाले और  दिखावे

घोटाले और दिखावे कर ये अपना घर  हैं भरते

ज्ञानी सारे  समझ समझ के भी इन पर हैं  मरते

इन पर हैं मरते डरें की कैसे खोलें इनकी पोल

मरवा डालेंगे अच्छा है पीटो इनकी ढोल

पीटो इनकी ढोल बनो मूरख अज्ञानी

भोगो नरक यहीं जो खुद की कदर न जानी

खुद की कदर न जानी जिंदगी इनके द्वार गवाई 

मांगता बनकर जिए समझ न फिर भी आयी

 

समझ न फिर भी आयी हाथ भी कुछ ना आया 

 

धन दौलत बाबा ने लूटी तुमको नाच नचाया 

 

तुमको नाच नचाया जेल में अब ये सड़ेंगे 

 

सुबह शाम अब जेल में ये चक्की पीसेंगे

 

चक्की पीसेंगे कर्मों का फल अब ये भोगेंगे 

 

भक्त रहे न घर या घाट के दूजा बाबा खोजेंगे 

~Indira

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